प्रचलित कथाएं
बाबा गरीबनाथ धाम से जुड़ी प्रचलित कथाएं जो भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
पहली कथा
कुल्हाड़ी के प्रहार से शिवलिंग का प्राकट्य
एक मजदूर था उसी की कुल्हाड़ी के प्रहार से शिवलिंग का प्राकट्य हुआ है। वह क्षेत्र उस समय जंगल था और मजदूर कुल्हाड़ी से वृक्ष की कटाई कर रहा था। लिंग पर अभी भी कटे हुए का निशान हैं। गरीबनाथ जन के नाम पर ही गरीबनाथ के नाम से बाबा प्रचलित हो गए। यह भी कहा जाता है की शिवलिंग पर कुल्हाड़ी का वार पड़ते ही लिंग से रक्त की धरा निकली थी।
दूसरी कथा
बाबा की कृपा से मुंशी जी का कल्याण
मुजफ्फरपुर शहर में एक साहूकार था जिसके फैले हुए व्यवसाय की देख-रेख एक मुंशी जी किया करते थे। मुंशी जी बाबा गरीबनाथ के परम भक्त थे। एकाएक साहूकार को व्यवसाय में घटा लगा और मुंशी जी की नौकरी चली गयी। मुंशी जी अपनी पत्नी और विवाहित पुत्री के साथ जीवन जी रहे थे। मुंशी जी की पुत्री की शादी एक संपन्न घराने में हुई थी, समय के साथ पुत्री के गौना का दिन निकट आ रहा था लेकिन इस कार्य के लिए धन की वयवस्था नहीं हो पा रही थी। परन्तु मुंशी जी नियमपूर्वक मंदिर आया करते थे और बाबा की विधिपूर्वक पूजा किया करते थे। पुत्री के गौना हेतु मुंशी जी ने अपनी जमीन बेचने का निश्चय किया लेकिन इस दिन निबंधक के न आने से मकान की रजिस्ट्री नहीं हो सकी। मुंशी जी बड़े दुखी मन से घर लौटे और पत्नी को सारी कथा सुनाई। पत्नी ने आश्चर्य से मुंशी जी की ओर देखा और कहा की कुछ देर पहले ही तो आप पकवान बनाने का सारा सामान, गहना, कपड़ा रखकर मंदिर गए थे। ये सभी गौना का सामान स्वं बाबा गरीबनाथ ने ही मुंशी भक्त के यहाँ पहुचाएँ थे और मुंशी जी ने धूमधाम से पुत्री का गौना किया। चुकि मुंशी जी गरीब थे और बाबा ने गरीब का कल्याण किया इसलिए बाबा का नाम गरीबनाथ पड़ गया।
तीसरी कथा
बाबा की जटा का दर्शन
तीसरी कथा के अंतर्गत बाबा के गर्भगृह में राजमिस्त्री द्वारा शिवलिंग के चारो तरफ थोड़ी खुदाई की जा रही थी जिसमे शिवलिंग के चारो ओर कवर लगाया जा सके। राजमिस्त्री ने शिवलिंग के नीचे हाथ डाला तो उसे बाबा का पूरा जटा हाथ में स्पर्श करता हुआ मालूम हुआ और वह डर से मूर्छित हो गया। मंदिर के लोगों ने उसे संभाला और होश आने पर उसने सारी बात बताई। साथ ही साथ उसने यह भी कहा की वह बिना स्नान किये यह कार्य कर रहा था। दूसरे दिन स्नान-ध्यान कर बाबा से माफ़ी मांग कर कार्य प्रारंभ किया उसे कार्य करने पर कोई कठिनाई नहीं आई।
चौथी कथा
आरती के समय सर्प का दर्शन
चौथी कथा यह है की एक दिन सुबह बाबा की आरती हो रही थी और आरती के समय ही वट-वृक्ष के तने से लटककर एक सर्प तबतक झूलता रहा जबतक की आरती ख़त्म नहीं हो गई, आरती ख़त्म होने के बाद सर्प अदृश्य हो गया। इस स्थिति का फोटोग्राफ मंदिर के रिकॉर्ड में उपलब्ध है।
पांचवी कथा
ट्रेन ड्राईवर की भक्ति
अगली कथा है की एक ट्रेन ड्राईवर था जो बाबा का अनन्य भक्त था। शिवरात्रि के दिन ड्राईवर मंदिर आया। बाबा की पूजा कर उसकी आँखें लग गई और वह सो गया। उसी दिन उसे ट्रेन लेकर मुजफ्फरपुर से बाहर जाना था। जब उसकी नींद खुली तो वह काफी घबरा गया और उसने स्टेशन फ़ोन किया। फ़ोन पर स्टेशन से जानकारी मिली की वह ड्राईवर जो सो गया था ट्रेन लेकर मुजफ्फरपुर से बाहर जा चुका है। यह कुछ नहीं बल्कि बाबा स्वयं ट्रेन ड्राईवर के रूप में गए थे। इस अद्भुत चमत्कार से ड्राईवर इतना प्रभावित हुआ की वह रेलवे सेवा से त्यागपत्र देकर बाबा की सेवा में दिन-रात लग गया। ऐसी एक नहीं अनेक कथाएँ हैं। भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और फिर बाबा की भक्ति में अपने को समर्पित कर देते हैं।